अजमेर। नगर निगम महापौर चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद शहर की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा किसी एक चेहरे की जीत या हार से ज्यादा उस सियासी गणित की हो रही है, जिसने मतदान के दिन पूरा समीकरण बदल दिया।

चुनाव से पहले कांग्रेस खेमे के पास 37 पार्षदों का आंकड़ा बताया जा रहा था। बहुमत के लिए कुछ और समर्थन की जरूरत थी और इसी बीच समर्थक पार्षदों की संख्या इससे भी अधिक होने के दावे राजनीतिक गलियारों में सुनाई दिए। ऐसे में कांग्रेस खेमे को लेकर तस्वीर मजबूत मानी जा रही थी।
लेकिन परिणाम ने इन तमाम दावों पर सवाल खड़े कर दिए।
दावों और परिणाम के बीच आखिर कहां बदला गणित?
महापौर चुनाव से पहले अलग-अलग पार्षदों के समर्थन को लेकर चर्चाएं चलती रहीं। कई नामों को लेकर राजनीतिक अटकलें लगाई गईं। सोफिया कुरैशी का नाम भी इसी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहा।
सोफिया कुरैशी के पिता पप्पू कुरैशी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बातचीत और उप महापौर पद को लेकर चर्चा किए जाने की बात सामने आई। हालांकि, इन बातों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे अंतिम राजनीतिक निर्णय मानना उचित नहीं होगा।
यही वजह है कि अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव से पहले जिस समर्थन का दावा किया जा रहा था, वह मतदान के समय कितनी हद तक कायम रहा?
क्रॉस वोटिंग की चर्चा, लेकिन प्रमाण कहां?
परिणाम के बाद राजनीतिक चर्चाओं में क्रॉस वोटिंग की बात सबसे ज्यादा सामने आई। कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों की सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं में भी पार्टी की रणनीति और नेतृत्व को लेकर सवाल उठते नजर आए।
धर्मेंद्र राठौड़ को लेकर भी तरह-तरह की राजनीतिक टिप्पणियां सामने आईं। कुछ चर्चाओं में कांग्रेस के अलग-अलग राजनीतिक धड़ों से जुड़े पार्षदों के रुख को लेकर सवाल उठे।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि महापौर चुनाव में मतदान गोपनीय होने के कारण बिना ठोस प्रमाण किसी विशेष पार्षद को क्रॉस वोटिंग के लिए जिम्मेदार ठहराना संभव नहीं है।
इसलिए असली राजनीतिक तस्वीर अभी भी कई सवालों के बीच है।
भाजपा ने 32 के आंकड़े से कैसे बनाई बढ़त?
भाजपा के पास 32 पार्षदों का आंकड़ा बताया जा रहा था। इसके बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में गया और अनामिका शर्मा महापौर निर्वाचित हुईं।
यहीं से चुनाव का सबसे दिलचस्प राजनीतिक सवाल सामने आता है—अगर भाजपा के पास अपने पार्षदों की संख्या बहुमत के लिए पर्याप्त नहीं थी, तो अंतिम परिणाम तक पहुंचते-पहुंचते उसके समर्थन का आंकड़ा किस तरह बदला?
क्या कुछ पार्षदों ने रणनीतिक रूप से अलग रुख अपनाया? क्या चुनाव से पहले किए जा रहे समर्थन के दावे वास्तविक मतदान तक कायम नहीं रहे? या फिर आखिरी समय में राजनीतिक समीकरण बदले?
इन सवालों के स्पष्ट जवाब फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
देवनानी की सक्रियता और भाजपा खेमे में बदला माहौल
परिणाम के बाद भाजपा खेमे में उत्साह नजर आया। वासुदेव देवनानी की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चा तेज हुई। नई महापौर अनामिका शर्मा के साथ उनकी मौजूदगी को भाजपा की स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया।
दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर चुनावी रणनीति और आपसी तालमेल को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इन सवालों का अंतिम जवाब पार्टी के भीतर होने वाली समीक्षा और नेताओं के सार्वजनिक बयानों से ही स्पष्ट होगा।
अब सवाल सिर्फ महापौर का नहीं, आगे की राजनीति का है
अजमेर महापौर चुनाव ने एक बात साफ कर दी है कि नगर निगम की राजनीति में केवल संख्या बल ही पूरी कहानी नहीं बताता। चुनाव से पहले के दावे, पार्षदों के बीच चलने वाली बातचीत, आखिरी समय के राजनीतिक समीकरण और मतदान के बाद सामने आने वाली प्रतिक्रियाएं—इन सभी को जोड़कर ही पूरी तस्वीर समझी जा सकती है।
फिलहाल अजमेर की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है—
37 के आंकड़े से शुरू हुई कहानी 32 के आंकड़े पर आकर कैसे बदल गई?
इस सवाल का जवाब सिर्फ चुनाव परिणाम में नहीं, बल्कि उन राजनीतिक समीकरणों में छिपा हो सकता है जो मतदान से पहले और मतदान के दौरान बने। आने वाले दिनों में यदि संबंधित नेता और पार्षद खुलकर अपनी बात रखते हैं, तो महापौर चुनाव की पूरी राजनीतिक तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।











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